दिल्ली की बदनाम गली का वो सच…जो आपको झकझोर कर रख देगा! जिसके बारे में शायद आपने कभी सोचा भी नही होगा।

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नई दिल्ली: दिल्ली के जीबी रोड का जिक्र आते ही हम सब असहज महसूस करने लगते हैं हमारी कोशिश ये रहती है कि हम जितना जल्दी हो सके इस विषय को छोड़ आगे बढ़ जाएं. पिछले दिनों एक पुरानी दोस्त विदेश से लौटी और ज़ोर दिया कि मैं उसके साथ दिल्ली के रेड लाइट एरिया में चलूं. मैंने दोस्त से पूछा तुम्हें क्या हो गया है और ऐसी जगह तुम्हे क्यों जाना है?

उसने कहा मुझे सेक्स वर्कर्स की जिंदगी से जुड़ी रिसर्च करनी है और ये मेरे प्रोजेक्ट का बहुत अहम हिस्सा है. मैंने अपनी दोस्त को मना कर दिया और उससे किसी और विषय पर बात करने की कोशिश करने लगा लेकिन मेरी दोस्त ने मेरी एक न मानी और मुझे रेड लाइट एरिया में जाने के लिए आखिरकार मना ही लिया.

मैं और मेरी मित्र अगली सुबह दिल्ली के रेड लाइट एरिया यानि कि जीबी रोड के लिए रवाना हुए. हमने जीबी रोड तक जाने का फैसला मेट्रो से किया. नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद हमें कमला मार्केट के लिए रिक्शा लेना था. सर्द भरी सुबह में भी मैं और मेरी मित्र पसीने से लथपथ थे. मेरी मित्र मुझ से भी ज्यादा घबराई हुई थी, हमने हिम्मत जुटा कर एक रिक्शा रुकवाया और कमला मार्केट की ओर चल पड़े. जैसे रेड लाइट एरिया शुरू हुआ हमारी सांसें तेज होने लगीं. छोटी-छोटी खिड़कियों से कुछ चेहरे सड़कों की ओर ऐसे ताक रहे थे जैसे उन्हें किसी का बेसब्री से इंतजार हो.

उस पल को हू-ब-हू शब्दों में पिरोना मेरे लिए नामुमकिन है. हम बड़ी मुश्किल से रिक्शे से नीचे उतरे लेकिन हमारे कदम जैसे एक ही जगह जम गए हों. हम चाहकर भी अपने कदम आगे नहीं बढ़ा पा रहे थे. हमने साहस किया और सामने की तरफ दिख रही इमारत की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे. इमारत की सीढ़ियों के बगल में ही कई दुकानें भी थीं इन्हीं दुकानों के बीच से ऊपर की ओर कुछ सीढ़ियां जा रही थीं. नीचे की तरफ एक खंभे पर मोटे-मोटे अक्षरों में एक नंबर लिखा हुआ था. इस विशेष नंबर का मतलब हमें बाद में बता चला.


हम इमारत में घुसने ही वाले थे तब ही एक शख्स ने हमें रोका और पूछने लगा कहा जा रहे हो भई? उस शख्स को मेरे आने से कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन मेरी मित्र के प्रवेश पर उसे काफी ऐतराज़ था. मैंने उस शख्स से कहा हम बस सेक्स वर्कर्स से कुछ बात करेंगे और वापस आ जाएंगे. हमने अपना-अपना परिचय दिया वह शख्स फिर भी न माना और एक महिला को आवाज देने लगा. कुछ देर बाद सामने के दरवाजे से एक महिला निकल कर आई और पूछने लगी क्या काम है क्यों आए हो, किसी एनजीओ से हो क्या?


मेरी मित्र ने हमारा वहां आने का मकसद बताया लेकिन वह महिला नहीं मानी. काफी देर बातचीत करने के बाद हमने कुछ रुपयों की पेशकश की, इसपर वह महिला सेक्स वर्कर्स से मिलवाने के लिए राज़ी हो गई, लेकिन इसी के साथ हमारे सामने कई शर्तें रखी गईं. हम अंदर कोई मोबाइल फोन और कैमरा नहीं ले जा सकते थे और बातचीत के दौरान वह महिला भी हमारे साथ ही रहने वाली थी. हम इन शर्तों के साथ अंदर जाने के लिए राज़ी हो गए.

उस इमारत के गेट में पहला कदम रखते ही हमारे होश उड़ गए इतनी कम जगह में बहुत सारी लड़कियां, पुरुष और लड़के भरे हुए थे. अंदर चारों चरफ हंसने और चीखने की आवाजें आ रही थीं. उस जगह पर बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी. हर तरफ जैसे अफरा-तफरी का माहौल हो. कुछ समय बाद हमें पता चला कि इस इमारत या फिर कहें कोठे में केवल कुछ खास राज्यों की लड़कियों को रखा गया है. सीढ़ियों के पास मौजूद वह विशेष नंबर इसलिए दिया गया था ताकि कोठों की पहचान संख्या से हो सके.


उस जगह बदबू के साथ-साथ मेकअप की भी तेज गंध आ रही थी. उसी हॉलनुमा कमरे में एक तरफ तीन छोटे-छोटे केबिन बने थे. इन छोटे केबिनों में लोग लड़कियों के साथ अंदर जा रहे थे और कुछ देर बाद वापस आ जा रहे थे. मेरी मित्र ने हिम्मत कर उस महिला से कहा कि उसे वह केबिन नुमा चीज देखनी है. इतना सुनते ही पहले तो वह महिला नाराज हुई लेकिन काफी देर तक ज़ोर देने के बाद वह मान गई, उस महिला ने एक लड़की को केबिन के अंदर जाने से रोकते हुए उसने हमें अंदर का नजारा दिखाया.

अंदर एक लोहे का पलंग रखा हुआ था जो उस केबिन के आकार के बराबर ही था. पलंग के नीचे कुछ पशु भी थे. जिनके मल-मूत्र की बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी. केबिन को देखने के बाद हमारा डर और भी ज्यादा बढ़ गया. मेरी मित्र भय से कांपने लगी…. कुछ देर तक स्तब्ध रहने के बार फिर से हमने अपने आप को संभाला. कुछ देर बाद मैंने साहस जुटा कर उस महिला से गुज़ारिश की कि वह हमारी बात किसी लड़की से करा दे.

इस पर उस महिला ने एक लड़की को इशारे से बुलाया. एक 20-22 साल की लड़की हमारी ओर आने लगी. मेरी दोस्त ने उस लड़की से नाम पूछा, लड़की ने अपना नाम बता दिया, लेकिन वह नाम उस लड़की का असली नाम नहीं था. मेरी दोस्त का अगला सवाल था आप कब से यहां हैं ? इस सवाल को सुनते ही हमारे पास खड़ी महिला बिगड़ गई और कहने लगी तुम लोग ये सब नहीं पूछ सकते.

हम एक दम सहम गए. हमने महिला से काफी आग्रह किया कि वो हमें कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दे. इसके बाद हमने कुछ और पैसे देने की बात रखी. महिला कुछ देर रुकी और फिर उस लड़की को अपने साथ लेकर चली गई. थोड़ी देर बाद उस महिला ने 30 से 35 साल की युवती को हमारे पास भेजा. इस युवती का बात करने का तरीका काफी अलग था…. यह युवती पहले वाली लड़की से उम्र में काफी बड़ी थी. उस युवती ने कहा- पूछो भाई क्या पूछना है, इस पर मेरी मित्र ने सवाल पूछने शुरू किए.

सवाल: आपका नाम क्या है
जवाब: मेरा नाम रानी है (बदला हुआ नाम)
सवाल : आप कब से यहां हैं ?
जवाब: जब से मैंने होश संभाला है.
सवाल: आपके परिवार में कौन-कौन है और क्या आपको अपने परिवार की याद नहीं आती ?
जवाब: मेरा परिवार यही है इस कोठे की सारी लड़किया मेरी बहने हैं इसके अलावा मेरा कोई परिवार नहीं है… ये कोठा ही हमारी रोज़ी रोटी है और यही हमारे लिए सबकुछ है.


रानी मेरी मित्र के हर सवाल का जवाब बड़ी ही बेबाकी से देती गई. लेकिन एक सवाल पर रानी का दर्द छलक उठा

सवाल: आपको आपनी मां की याद नहीं आती ?
जबाव: (रानी पहले कुछ देर तक खामोश रही, फिर भरे हुए स्वर में बोली) हां…मां की याद आती है हर दिन आती है और जब दर्द होता है तब सबसे ज्यादा आती है.

रानी के इस जवाब के बाद हमारे पास कोई सवाल शेष न रह गया था. मैं और मेरी मित्र काफी देर तक एक दूसरे का मुंह देखते रहे. साधरण सी दिखने वाली उस युवती के चहरे पर र्दद, हताशा और लाचारी साफ नजर आ रही थी. चाहते हुए भी हम रानी के ज्यादा बात नहीं कर पाए. रानी की आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंजती है. रानी का उदासीन चेहरा आज में भी मेरी आंखों के सामने से ओझल नहीं हो सका है.

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज भी हम वेश्यावृत्ति जैसे विषय पर बात करने से डरते हैं. न जाने रानी जैसी कितनी ही युवतियों को जबरन इस नर्क में ढकेल दिया जाता है. अगर आंकड़ों की बात करें तो, देश में रोजाना लगभग 2000 लाख रुपये का देह व्यापार होता है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के अनुसार भारत में 68 फीसदी लड़कियों को रोज़गार का झांसा देकर वेश्यालयों तक पहुंचाया जाता है.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि 17 प्रतिशत लड़कियों को शादी का वादा करके इस धंधे में ढकेल दिया जाता है. उपरोक्त लिखे आंकड़े चौकाने वाले हैं. विकास के मार्ग पर अग्रसर आज के भारत में जब हमें रानी जैसी युवती की पीढ़ा देखने को मिलती है तो हम इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर क्यों नहीं होते ? अब समय आ गया है कि हम वेश्यवृत्ति जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा करें और समाज को सही मायनों में प्रगतिशील बनाएं ताकि फिर किसी रानी को अपनी मां से अलग न होना पड़े.