दिल्ली मेट्रो के यात्रियों को मिलेगा तोहफा, तकनीक के मामले में चुनिंदा देशों में शामिल हुआ भारत

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दिल्ली मेट्रो ने 24 दिसंबर को अपने परिचालन के 19 साल पूरे कर लिए और 20वें साल में प्रवेश किया। इस मौके पर दिल्ली मेट्रो के सबसे पुराने कारिडोर रेड लाइन (रिठाला-गाजियाबाद न्यू बस अड्डा) पर स्वदेशी सिग्नल सिस्टम आइ-एटीएस (स्वदेशी – आटोमेटिक ट्रेन सुपरविजन) का ट्रायल शुरू हुआ। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये इसका शुभारंभ किया। अगले साल से रेड लाइन पर स्वदेशी सिग्नल सिस्टम से मेट्रो रफ्तार भरने लगेगी। अभी तक मेट्रो के परिचालन में विदेशी सिग्नल सिस्टम का इस्तेमाल होता रहा है। इस वजह से डीएमआरसी सहित देश भर के मेट्रो नेटवर्क का भारी भरकम रकम सिग्नल सिस्टम के साफ्टवेयर पर खर्च होता है। इसके मद्देनजर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के निर्देश पर डीएमआरसी ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमेटेट (बीईएल) के साथ मिलकर संचार आधारित ट्रेन कंट्रोल (सीबीटीसी) के विकास का कार्य शुरू किया। इसके तहत आइ-एटीएस को विकसित किया गया, जिसका ट्रायल शुरू कर दिया गया। इस दौरान डीएमआरसी के प्रबंधन निदेशक मंगू सिंह मौजूद थे।

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डीएमआरसी का कहा है कि स्वदेशी सिग्नल सिस्टम के विकास से भारत दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां यह तकनीक उपलब्ध हो गई है। जिसका इस्तेमाल दिल्ली मेट्रो के अलावा अन्य शहरों के मैट्रो परिचालन व रेलवे में हो सकेगा। एटीएस का विकास संचार आधारित ट्रेन कंट्रोल सिग्नल सिस्टम को विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। संचार आधारित ट्रेन कंट्रोल सिग्नल सिस्टम की मदद से महज डेढ़ मिनट के अंतराल पर मेट्रो का परिचालन हो सकता है। मौजूदा समय में मजेंटा व पिंक लाइन पर संचार आधारित ट्रेन कंट्रोल सिग्नल सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिए डीएमआरसी को विदेशी कंपनी की मदद लेनी पड़ रही है। क्योंकि इस तकनीक में यूरोप के देशों और जापान का इस तकनीक में वर्चस्व है। लेकिन फेज चार के कारिडोर पर डीएमआरसी स्वदेशी संचार आधारित ट्रेन कंट्रोल सिग्नल सिस्टम का इस्तेमाल करेगा।

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