राजधानी के निजी स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ने लगा है। किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर स्कूल प्रबंधन मनमाने दाम वसूल रहा है। शिक्षा निदेशालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्कूल किसी खास विक्रेता से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इसके अलावा, स्कूलों को अपनी वेबसाइट पर कम से कम पांच दुकानों की जानकारी देनी थी, जिससे अभिभावक अपनी सुविधा के अनुसार वहां से खरीदारी कर सकें।
हालांकि, इसके बावजूद कई निजी स्कूल कैंपस के भीतर ही निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें, स्टेशनरी और यूनिफॉर्म बेच रहे हैं। इतना ही नहीं, अलग-अलग कक्षाओं के लिए यूनिफॉर्म का डिजाइन भी अलग कर दिया गया है, जिससे अभिभावकों को बार-बार नई यूनिफॉर्म खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
पांच से आठ हजार रुपये तक बिक रहीं किताबें
शिक्षा निदेशालय के आदेशों की अवहेलना करते हुए राजधानी के कई निजी स्कूलों ने किताबों और स्टेशनरी के दामों में भारी बढ़ोतरी कर दी है।
- महाराजा अग्रसेन स्कूल (अशोक विहार) में प्री-स्कूल के लिए किताबों और स्टेशनरी का सेट ₹4940, पहली कक्षा के लिए ₹6345, पाँचवीं के लिए ₹8239, सातवीं के लिए ₹8311 और आठवीं कक्षा के लिए ₹8935 में बेचा जा रहा है।
- मैसोनिक पब्लिक स्कूल (वसंत कुंज) में आठवीं कक्षा की किताबें और स्टेशनरी ₹5598 में मिल रही हैं।
- सुमेरमल जैन पब्लिक स्कूल (जनकपुरी) में पाँचवीं कक्षा की किताबों और स्टेशनरी का सेट ₹4931 में बेचा जा रहा है।
- श्रीजन स्कूल में आठवीं कक्षा के लिए सेट ₹8000 तक पहुंच गया है।
एनसीईआरटी की जगह निजी प्रकाशकों की किताबों पर जोर
निजी स्कूल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को दरकिनार कर एनसीईआरटी की किताबों की बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें बेच रहे हैं। स्कूलों में बेचे जा रहे सेट में अधिकतर किताबें निजी प्रकाशकों की हैं, जबकि एनसीईआरटी की केवल इक्का-दुक्का किताबें शामिल हैं। अभिभावकों से कहा जा रहा है कि अगर सेट में लिखी गई एनसीईआरटी की किताबें चाहिए तो वे उन्हें खुद बाहर से खरीदें।
गौर करने वाली बात यह है कि जहां एनसीईआरटी की किताबें ₹30 से ₹100 तक मिलती हैं, वहीं उसी विषय की निजी प्रकाशक की किताब ₹300 से ₹700 तक बेची जा रही है। कुछ स्कूल अभिभावकों को आकर्षित करने के लिए पूरे सेट पर छूट जैसे ऑफर भी दे रहे हैं, ताकि वे इसे लेने के लिए मजबूर हो जाएं।
यूनिफॉर्म के नाम पर भी अभिभावकों की जेब पर बोझ
निजी स्कूलों की लूट केवल किताबों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यूनिफॉर्म के नाम पर भी अभिभावकों को चूना लगाया जा रहा है।
- कई स्कूलों ने अलग-अलग कक्षाओं के लिए अलग-अलग यूनिफॉर्म अनिवार्य कर दी है, जिससे बच्चों की क्लास बदलते ही नई यूनिफॉर्म खरीदनी पड़े।
- निदेशालय के निर्देश के बावजूद स्कूलों ने यूनिफॉर्म के लिए बाहर के विक्रेताओं की जानकारी साझा नहीं की है।
- स्कूलों ने यूनिफॉर्म का डिज़ाइन भी बदल दिया है, जिससे माता-पिता मजबूर होकर स्कूल कैंपस में ही उपलब्ध महंगी यूनिफॉर्म खरीदने पर विवश हो रहे हैं।
प्रशासन की चुप्पी, अभिभावकों की बढ़ी चिंता
अभिभावकों ने इस मुद्दे पर कई बार शिकायतें दर्ज करवाई हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। निजी स्कूलों की मनमानी और बढ़ती फीस के कारण आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। शिक्षा निदेशालय को इस पर जल्द से जल्द सख्त कदम उठाने की जरूरत है, ताकि अभिभावकों को इस आर्थिक शोषण से राहत मिल सके।